अजय अनेजा 👉 संपादक उत्तराखंड जागरण 👉
वायरल ऑडियो के बावजूद पत्रकार पर मुकदमा, SBI काशीपुर प्रकरण में पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल
काशीपुर (उधम सिंह नगर)।
जनपद उधम सिंह नगर में एक बार फिर पुलिस की कार्यप्रणाली और निष्पक्ष जांच को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला भारतीय स्टेट बैंक (SBI) काशीपुर शाखा की शाखा प्रबंधक और एक स्थानीय पत्रकार से जुड़ा है, जहां वायरल ऑडियो सामने आने के बावजूद पुलिस ने चौंकाने वाला कदम उठाते हुए पैसे की पेशकश करने वाली बैंक मैनेजर पर कोई कार्रवाई नहीं की, जबकि उल्टा पत्रकार के खिलाफ रंगदारी का मुकदमा दर्ज कर दिया गया।
पूरा विवाद उस समय सामने आया जब एक व्हाट्सएप कॉल का ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। ऑडियो में स्पष्ट रूप से सुना जा सकता है कि कॉल स्वयं SBI काशीपुर की शाखा प्रबंधक द्वारा की गई है। बातचीत की शुरुआत में ही शाखा प्रबंधक यह कहती सुनाई देती हैं— “मैं इसलिए कॉल कर रही हूँ कि आप कंफर्ट रहें…”।
इसके बाद बातचीत में समझौते, हालात मैनेज करने और पैसों की पेशकश जैसे शब्द शाखा प्रबंधक की ओर से सामने आते हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि पूरे वायरल ऑडियो में कहीं भी पत्रकार की ओर से न तो पैसों की मांग की गई और न ही किसी प्रकार की धमकी या रंगदारी का कोई संकेत सुनाई देता है। इसके बावजूद पुलिस द्वारा बिना फॉरेंसिक जांच और कॉल की निष्पक्ष पड़ताल किए सीधे पत्रकार पर मुकदमा दर्ज कर दिया गया, जिससे पुलिस की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं।
बिना जांच—सीधे मुकदमा?
स्थानीय नागरिकों और पत्रकारों का आरोप है कि पुलिस ने न तो ऑडियो की सत्यता की फॉरेंसिक जांच कराई और न ही यह जांचा कि कॉल किसने की और बातचीत किस दिशा में गई। आरोप है कि पुलिस ने “ना खाता, ना बही—जो बैंक मैनेजर ने कहा वही सही” की तर्ज पर एकतरफा कार्रवाई की।
आरोपों से बचने की साजिश?
सूत्रों के अनुसार, संबंधित शाखा प्रबंधक पर पहले से ही कई गंभीर आरोप लगे हुए थे। आशंका जताई जा रही है कि इन्हीं आरोपों से बचने के लिए एक सोची-समझी रणनीति के तहत पत्रकार को फंसाने की कोशिश की गई। वायरल ऑडियो में बातचीत का स्वर और शब्द इस ओर इशारा करते हैं कि पूरा संवाद पूर्व नियोजित (Pre-planned) हो सकता है।
पत्रकार संगठनों में भारी रोष
पत्रकार पर मुकदमा दर्ज होने के बाद जिले भर के पत्रकारों में भारी आक्रोश है। पत्रकार संगठनों का कहना है कि यदि सवाल पूछने वाला पत्रकार ही आरोपी बना दिया जाएगा और पैसे की पेशकश करने वाला सुरक्षित रहेगा, तो यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा हमला है।
अब सबसे बड़ा सवाल
क्या सच सामने लाने और सवाल पूछने की कीमत अब रंगदारी के मुकदमे से चुकानी पड़ेगी?
और क्या उधम सिंह नगर पुलिस बिना निष्पक्ष जांच प्रभावशाली लोगों के दबाव में काम कर रही है?
फिलहाल मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। आने वाले दिनों में यह विवाद पुलिस की कार्यशैली, बैंक प्रशासन की जवाबदेही और प्रेस की आज़ादी—तीनों के लिए एक बड़ी कसौटी साबित हो सकता है।







