अजय अनेजा 👉 संपादक 👉 उत्तराखण्ड जागरण 👉 उत्तराखंड में गुलदार के आहार और व्यवहार में बीते कुछ वर्षों में बड़ा परिवर्तन देखने को मिल रहा है। मशहूर शिकारी जॉय हुकिल के अनुसार गुलदार अब जंगल में कठिन संघर्ष वाले शिकार के बजाय बस्तियों के आसपास आसान भोजन की ओर झुक रहा है। जंगल में हिरन, घुरड़ और काकड़ जैसे प्राकृतिक शिकार की संख्या घटने और गुलदारों की संख्या बढ़ने से उसका पारंपरिक भोजन तंत्र प्रभावित हुआ है। ऐसे में वह गाय, कुत्तों जैसे आसानी से उपलब्ध शिकार के लिए आबादी वाले क्षेत्रों के समीप रहने लगा है।जॉय हुकिल का कहना है कि जंगल में शिकार के लिए गुलदार को काफी ऊर्जा और समय खर्च करना पड़ता है और कई बार प्रयास के बाद भी सफलता नहीं मिलती, जबकि बस्तियों के पास उसे बिना अधिक संघर्ष भोजन उपलब्ध हो जाता है। इसी कारण गुलदार में संघर्ष के बजाय इंसान जैसी ही शॉर्टकट अपनाने, शातिर प्रकृत्ति और कामचोरी जैसी प्रवृत्ति विकसित हो रही है, जिसकी चपेट में कई बार इंसान भी आ जाता है।
जॉय हुकिल के अनुसार मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने के पीछे पहाड़ों से पलायन और खेती का सिमटना भी एक बड़ा कारण है। गांवों के खाली होने से आसपास झाड़ियां बढ़ गई हैं, जिससे गुलदार को छिपने और बस्तियों के पास आने में आसानी हो रही है। पहले आबादी और खेती के कारण साफ-सफाई रहती थी और वन्यजीवों की गतिविधि दूर से ही दिखाई दे जाती थी।गुलदार इंसान का स्वाभाविक शत्रु नहीं, लेकिन परिस्थितिवश हो रहा नरभक्षी
उन्होंने यह भी कहा कि गुलदार मांसाहारी है और भोजन के लिए उसके पास मांस के अलावा कोई विकल्प नहीं है। जंगल में भोजन की कमी और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण वह बस्तियों की ओर बढ़ रहा है। गुलदार इंसान का स्वाभाविक शत्रु नहीं है, लेकिन भूख और परिस्थितियों के कारण मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं सामने आ रही हैं, जो आगे चलकर उसे नरभक्षी बना देती हैं।
मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए जॉय हुकिल ने घटनाओं पर त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता बताई। उनका कहना है कि बस्तियों के पास गुलदार की सूचना मिलते ही उसे पकड़ कर सुरक्षित क्षेत्र में छोड़ा जाए और आवश्यकता पड़ने पर अंतिम विकल्प के रूप में उसे आदमखोर घोषित कर मार दिया जाये ताकि मानव जीवन और वन्यजीव दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।







