अजय अनेजा 👉 पत्रकार संपादक उत्तराखंड जागरण 👉
भीमताल में ‘आतंक’ बना बाघ पिंजरे में, पर बड़ा सवाल बरकरार — यही था आदमखोर या फिर वन विभाग की खानापूर्ति?
सूर्या गांव में महिला को निवाला बनाने के बाद देर रात पकड़ाया बाघ, अब मूंछ और अन्य सैंपल से होगी जांच; दहशत अभी खत्म नहीं

भीमताल। भीमताल क्षेत्र में कई दिनों से दहशत का पर्याय बने बाघ को आखिरकार वन विभाग ने पकड़ने में सफलता हासिल कर ली है। सूत्रों के अनुसार, भीमताल विकासखंड के सूर्या गांव में हंसी देवी को निवाला बनाने वाले संदिग्ध बाघ को देर रात ट्रेंकुलाइज कर पकड़ लिया गया और उसे रेस्क्यू सेंटर रानीबाग भेज दिया गया है। हालांकि, सबसे बड़ा सवाल अब भी जस का तस है — क्या यही वही आदमखोर बाघ है, जिसने क्षेत्र में आतंक मचाया था, या फिर यह कार्रवाई सिर्फ लोगों के गुस्से को शांत करने की खानापूर्ति भर है?
वन विभाग की इस कार्रवाई के बाद क्षेत्र के लोगों ने कुछ हद तक राहत की सांस जरूर ली है, लेकिन ग्रामीणों के मन से डर अभी खत्म नहीं हुआ है। वजह साफ है — जब तक जांच रिपोर्ट नहीं आती, तब तक यह दावा नहीं किया जा सकता कि पकड़ा गया बाघ ही मानव पर हमला करने वाला आदमखोर था।
जानकारी देते हुए वन क्षेत्र अधिकारी नितिन पंत ने बताया कि देर रात बाघ को सफलतापूर्वक पकड़ा गया और आवश्यक प्रक्रिया के बाद उसे रानीबाग रेस्क्यू सेंटर भेज दिया गया। उन्होंने बताया कि बाघ आदमखोर है या नहीं, इसकी पुष्टि के लिए आगे की जांच की जा रही है। बताया जा रहा है कि मूंछ, शारीरिक नमूने और अन्य वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर यह तय किया जाएगा कि यही वही बाघ है या नहीं, जिसने महिला पर हमला किया था।
“लोग अभी भी सतर्क रहें” — ब्लॉक प्रमुख
भीमताल के ब्लॉक प्रमुख डॉ. हरीश सिंह बिष्ट ने भी लोगों से अपील की है कि वे अभी पूरी तरह निश्चिंत न हों। उन्होंने कहा कि जब तक जांच रिपोर्ट नहीं आ जाती, तब तक यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि पकड़ा गया बाघ ही आदमखोर था। उन्होंने क्षेत्रवासियों से सावधानी बरतने और अनावश्यक रूप से जंगल या सुनसान इलाकों की ओर न जाने की अपील की।
डॉ. बिष्ट ने इस अभियान में जुटे वन विभाग के अधिकारियों, चिकित्सकों और रेस्क्यू टीम को धन्यवाद देते हुए कहा कि बाघ के पकड़े जाने से लोगों को कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन मानव-वन्यजीव संघर्ष की यह घटना एक बार फिर सिस्टम की तैयारियों और वन क्षेत्र से सटे गांवों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
दहशत में जी रहा था इलाका
ग्रामीणों का कहना है कि बाघ के लगातार मंडराते खतरे ने पूरे इलाके का सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया था। शाम ढलते ही लोग घरों में कैद होने लगे थे। खेतों, जंगल किनारे और रास्तों पर आवाजाही कम हो गई थी। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों में सबसे ज्यादा डर का माहौल था। हंसी देवी की मौत के बाद तो पूरे क्षेत्र में गुस्सा, डर और बेचैनी चरम पर पहुंच गई थी।
सबसे बड़ा सवाल — क्या अब खतरा टला?
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम और संवेदनशील पहलू है। यदि पकड़ा गया बाघ ही आदमखोर साबित होता है, तो यह वन विभाग की बड़ी सफलता मानी जाएगी। लेकिन यदि जांच में कुछ और सामने आता है, तो फिर यह सवाल और तेज़ हो जाएगा कि क्या क्षेत्र में अभी भी कोई और खूंखार बाघ खुला घूम रहा है?
यही वजह है कि स्थानीय लोग अब सिर्फ पकड़ने की कार्रवाई नहीं, बल्कि पुख्ता वैज्ञानिक पुष्टि चाहते हैं।
मानव-वन्यजीव संघर्ष पर फिर बहस तेज
भीमताल की यह घटना एक बार फिर पहाड़ में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष की भयावह तस्वीर सामने लाती है। जंगल सिमट रहे हैं, आबादी बढ़ रही है, और वन्यजीव आबादी के बीच घुस रहे हैं। नतीजा — कभी बाघ, कभी गुलदार, तो कभी हाथियों का आतंक ग्रामीण इलाकों में आम होता जा रहा है। सवाल सिर्फ एक बाघ को पकड़ने का नहीं, बल्कि स्थायी समाधान, निगरानी, सुरक्षा और त्वरित वन्यजीव प्रतिक्रिया तंत्र का है।
“बाघ पकड़ा गया, लेकिन क्या आतंक खत्म हुआ?”
“आदमखोर की पुष्टि से पहले राहत अधूरी”
“भीमताल में इंसान बनाम जंगल का संघर्ष फिर सुर्खियों में”







