डीएफओ कुंदन कुमार की पहल: जंगलों में तस्करों की घुसपैठ पर एआई की नजर, स्वदेशी तकनीक से बने ‘आर्टिफिशियल कान’

अजय अनेजा 👉 पत्रकार संपादक उत्तराखंड जागरण 👉 हल्द्वानी 👉
डीएफओ कुंदन कुमार की पहल: जंगलों में तस्करों की घुसपैठ पर एआई की नजर, स्वदेशी तकनीक से बने ‘आर्टिफिशियल कान’
हल्द्वानी। वन संरक्षण और वन्यजीव सुरक्षा के क्षेत्र में हल्द्वानी वन प्रभाग ने तकनीक के इस्तेमाल की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। डीएफओ कुंदन कुमार के नेतृत्व में हल्द्वानी वन प्रभाग ने उत्तराखंड में पहली बार कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित ‘फॉरेस्ट अकॉस्टिक सर्विलांस सिस्टम’ का इस्तेमाल शुरू किया है। यह अत्याधुनिक स्वदेशी तकनीक जंगलों में वन तस्करों और शिकारियों की घुसपैठ पर नजर रखने के साथ ही अवैध पेड़ कटान और संदिग्ध मानवीय गतिविधियों का रियल-टाइम में पता लगाने में मदद करेगी।
जंगल में 24 घंटे ‘डिजिटल कान’ की तरह करेगा काम
नई प्रणाली जंगल में एक ऐसे डिजिटल कान की तरह काम करेगी, जो दूर तक होने वाली संदिग्ध गतिविधियों की आवाज को पहचान सकेगी। इसमें लगाए गए अत्याधुनिक ध्वनिक सेंसर और एआई तकनीक को चेनसॉ, कुल्हाड़ी, गोलीबारी, वाहनों की आवाज और मानव गतिविधियों जैसी ध्वनियों की पहचान के लिए प्रशिक्षित किया गया है।
जैसे ही सेंसर को कोई संदिग्ध आवाज सुनाई देगी, सिस्टम उसका विश्लेषण कर तत्काल वन विभाग के नियंत्रण कक्ष को अलर्ट भेज सकेगा। इससे वनकर्मियों को संभावित घटना की जानकारी समय रहते मिल जाएगी और मौके पर त्वरित कार्रवाई के लिए गश्ती दल रवाना किया जा सकेगा।
बिजली और मोबाइल नेटवर्क के बिना भी निगरानी
इस तकनीक की खासियत यह है कि इसे दुर्गम वन क्षेत्रों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। सिस्टम में एज कम्प्यूटिंग, ध्वनिक सेंसर और लंबी दूरी की वायरलेस संचार तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। सौर ऊर्जा से संचालित बैटरी व्यवस्था के कारण यह सिस्टम बिजली के पारंपरिक ग्रिड और मोबाइल नेटवर्क की उपलब्धता के बिना भी लगातार काम करने में सक्षम है।
पारंपरिक वन गश्त के साथ इस तकनीक का इस्तेमाल वन विभाग की निगरानी क्षमता को और मजबूत करेगा। खासतौर पर ऐसे जंगल क्षेत्रों में, जहां मानव गश्त करना कठिन है या जहां तस्करों और शिकारियों की गतिविधियों का खतरा बना रहता है, वहां यह प्रणाली अतिरिक्त सुरक्षा कवच का काम कर सकती है।
वन्यजीवों की गतिविधियों पर भी रहेगी नजर
फॉरेस्ट अकॉस्टिक सर्विलांस सिस्टम का इस्तेमाल केवल अपराध रोकने तक सीमित नहीं रहेगा। एआई के जरिए जंगल में मौजूद वन्यजीवों की आवाजों का स्वतः विश्लेषण किया जा सकेगा। इससे विभिन्न वन्यजीव प्रजातियों की मौजूदगी, उनके आवागमन और व्यवहार से जुड़ा डेटा जुटाने में मदद मिलेगी।
यह जानकारी भविष्य में जैव विविधता संरक्षण और वन्यजीव प्रबंधन की योजनाएं तैयार करने में भी उपयोगी साबित हो सकती है। इस तरह तकनीक एक तरफ जंगलों में अवैध गतिविधियों पर नजर रखेगी, तो दूसरी तरफ वन्यजीवों के वैज्ञानिक अध्ययन में भी मददगार बनेगी।
डीएफओ कुंदन कुमार के अनुसार, यह तकनीक अवैध कटान और शिकार जैसी गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी के साथ-साथ जैव विविधता की निगरानी में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। एआई आधारित ध्वनि विश्लेषण से वन्यजीवों की उपस्थिति और गतिविधियों को लगातार रिकॉर्ड एवं समझने में मदद मिलेगी।
हल्द्वानी वन प्रभाग की यह पहल वन संरक्षण में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। आने वाले समय में जंगलों की निगरानी में वनकर्मियों की गश्त के साथ एआई के ‘डिजिटल कान’ तस्करों और शिकारियों के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं।