अजय अनेजा 👉 पत्रकार संपादक उत्तराखंड जागरण 👉
खाली चेक पर साइन करके बच नहीं सकते! हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, हस्ताक्षर मानते ही कानूनी जिम्मेदारी तय
नैनीताल। खाली चेक पर केवल हस्ताक्षर करने के बाद यह कहना कि चेक के बाकी विवरण किसी दूसरे व्यक्ति ने भरे हैं, अब कानूनी बचाव का आसान आधार नहीं माना जाएगा। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि चेक पर किए गए हस्ताक्षर संबंधित व्यक्ति के होने की बात स्वीकार है, तो निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (एनआई एक्ट) के तहत कानूनी धारणा लागू होती है।
न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने अल्मोड़ा निवासी रमेश सिंह नगरकोटी की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता ने सत्र न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें ट्रायल कोर्ट से मिली सजा के खिलाफ उसकी अपील खारिज कर दी गई थी।
मामला दो लाख रुपये के बैंक चेक से जुड़ा था। चेक बैंक में प्रस्तुत किए जाने पर खाते में पर्याप्त धनराशि नहीं होने के कारण अनादरित हो गया। इसके बाद कानूनी नोटिस भेजे जाने के बावजूद चेक की राशि का भुगतान नहीं किया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उसने चेक पर केवल हस्ताक्षर किए थे और उसे कुलदीप बिष्ट को दिया था। उसका आरोप था कि बाद में इस खाली चेक का कथित रूप से दुरुपयोग किया गया। यह भी कहा गया कि चेक पर मौजूद लिखावट उसके हस्ताक्षर से अलग है, जिससे स्पष्ट है कि बाकी विवरण किसी अन्य व्यक्ति ने भरे हैं।
हाई कोर्ट ने इन दलीलों पर स्पष्ट किया कि चेक के बाकी विवरण किसी अन्य व्यक्ति द्वारा भरे जाने अथवा चेक पर हस्ताक्षर और अन्य लिखावट में अंतर होने मात्र से कानूनी धारणा समाप्त नहीं हो जाती। अदालत ने पाया कि चेक पर हस्ताक्षर याचिकाकर्ता के होने की बात विवादित नहीं थी।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि हस्ताक्षर स्वीकार होने की स्थिति में एनआई एक्ट के तहत संबंधित कानूनी धारणा लागू होती है। केवल यह कह देना कि चेक खाली था और बाद में किसी दूसरे व्यक्ति ने उसमें विवरण भरे, अपने आप में कानूनी दायित्व से मुक्ति का आधार नहीं बनता।
इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता को एक वर्ष के साधारण कारावास और 2.20 लाख रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई थी। सत्र न्यायालय से राहत नहीं मिलने के बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा। हाई कोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए निचली अदालतों के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
अदालत के फैसले से साफ संदेश
फैसले का व्यावहारिक संदेश यह है कि किसी अन्य व्यक्ति को खाली चेक पर हस्ताक्षर करके देना जोखिम से खाली नहीं है। बाद में चेक के विवरण किसी और की लिखावट में होने मात्र से हस्ताक्षरकर्ता अपने ऊपर बनने वाले कानूनी दायित्व से स्वतः मुक्त नहीं हो जाता।

