अजय अनेजा 👉 पत्रकार संपादक उत्तराखंड जागरण 👉
देवभूमि की बदलती तस्वीर! उत्तराखंड में तेजी से बदल रही जनसांख्यिकी, सीमांत से लेकर हरिद्वार तक बढ़ी चिंता
हरिद्वार, नैनीताल, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ समेत कई जिलों में बाहरी बसावट, सत्यापन और सुरक्षा को लेकर उठे सवाल; सरकार ने जिला प्रशासन को सतर्क रहने के दिए निर्देश।
देहरादून। उत्तराखंड में जनसांख्यिकीय (डेमोग्राफिक) बदलाव को लेकर बहस तेज हो गई है। राज्य के विभिन्न जिलों में बाहरी राज्यों से आकर बसने वाले लोगों की बढ़ती संख्या, सीमांत क्षेत्रों में बदलती आबादी और सुरक्षा संबंधी चिंताओं ने इस मुद्दे को गंभीर बना दिया है। सरकार ने भी जिला प्रशासन और पुलिस को अन्य राज्यों से आकर बसे लोगों के सत्यापन, जिला स्तरीय समितियों के गठन तथा फर्जी पहचान के आधार पर रह रहे लोगों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।

उपलब्ध जनसंख्या संबंधी आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत वर्ष 2001 के लगभग 11.9 प्रतिशत से बढ़कर करीब 13.9 प्रतिशत तक पहुंचने का दावा किया जा रहा है। वहीं, हरिद्वार जिले में समुदाय विशेष की आबादी में उल्लेखनीय वृद्धि को लेकर विभिन्न सामाजिक संगठनों ने चिंता जताई है। स्थानीय स्तर पर यह भी कहा जा रहा है कि आबादी के साथ धार्मिक संस्थानों और इबादत स्थलों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है, जिससे समय-समय पर विवाद की स्थिति भी बनी है।
सीमांत जिला पिथौरागढ़ में नेपाल और अन्य राज्यों से आकर कारोबार करने वाले लोगों की संख्या बढ़ने को लेकर स्थानीय लोगों ने सुरक्षा संबंधी सवाल उठाए हैं। चीन और नेपाल सीमा से लगे इस जिले में नोटिफाइड एरिया व्यवस्था को फिर से लागू करने की मांग भी उठ रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पलायन के कारण गांव खाली हो रहे हैं, जबकि बाहरी लोगों की बसावट लगातार बढ़ रही है।
अल्मोड़ा और नैनीताल जैसे पर्वतीय जिलों में भी बाहरी लोगों द्वारा जमीन और मकान खरीदकर स्थायी रूप से बसने की खबरें सामने आ रही हैं। हल्द्वानी, गौलापार, लामाचौड़, रामनगर और कालाढूंगी जैसे क्षेत्रों में नई बस्तियां विकसित होने की चर्चा है। पुलिस और खुफिया एजेंसियां ऐसे क्षेत्रों पर निगरानी बनाए हुए हैं तथा किरायेदारों और कर्मचारियों के सत्यापन पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
राज्य सरकार का कहना है कि उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति, नेपाल और चीन से लगी अंतरराष्ट्रीय सीमाएं तथा देवभूमि की सांस्कृतिक पहचान को देखते हुए प्रत्येक बाहरी व्यक्ति का नियमानुसार सत्यापन आवश्यक है। सरकार का उद्देश्य किसी भी वैध नागरिक के अधिकारों का हनन नहीं, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना और कानून का पालन सुनिश्चित करना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जनसांख्यिकीय बदलाव, पलायन, रोजगार, शहरीकरण और प्रवासन जैसे कई सामाजिक-आर्थिक कारणों से प्रभावित होता है। ऐसे में इस विषय पर किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक जनगणना और सरकारी आंकड़ों के आधार पर संतुलित विश्लेषण आवश्यक है। फिलहाल सरकार का फोकस सत्यापन अभियान, सीमांत क्षेत्रों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को मजबूत करने पर है।
