देखिए सीएम साहब इन नेताओ कैमरे की आड़ में गुंडागर्दी? पार्षद की चीख-पुकार से तहसील की गरिमा चकनाचूर देखें वीडियो

अजय अनेजा 👉 पत्रकार संपादक उत्तराखंड जागरण 👉 हल्द्वानी 👉
“कैमरे के सामने ‘दम’ दिखाने की राजनीति: पार्षद ने नायब तहसीलदार पर बरसाई आवाज, शिष्टाचार तार-तार”
हल्द्वानी।
जनप्रतिनिधियों के आचरण और मर्यादा पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। हल्द्वानी में सामने आए एक वीडियो ने प्रशासनिक गरिमा और राजनीतिक व्यवहार—दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। वीडियो में एक चुने हुए पार्षद को नायब तहसीलदार पर चीखते-चिल्लाते और पूरे घटनाक्रम को मोबाइल कैमरे में कैद करते देखा जा रहा है। यह घटना अब सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन चुकी है और जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली पर गंभीर बहस छेड़ रही है।

बताया जा रहा है कि पार्षद किसी ज्ञापन को लेकर तहसील पहुंचे थे। उनका आरोप है कि नायब तहसीलदार कार्यालय में बैठे रहे और ज्ञापन लेने बाहर नहीं आए। इसी बात को लेकर पार्षद का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने न सिर्फ ऊंची आवाज में अधिकारी से बहस की, बल्कि पूरे घटनाक्रम को रिकॉर्ड कर उसे सार्वजनिक मंचों तक पहुंचा दिया।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी जनप्रतिनिधि को यह अधिकार है कि वह सार्वजनिक रूप से किसी सरकारी अधिकारी की गरिमा को इस तरह ठेस पहुंचाए? लोकतंत्र में असहमति और शिकायत दर्ज कराने के कई औपचारिक और व्यवस्थित तरीके मौजूद हैं। यदि किसी अधिकारी के कार्य से असंतोष था, तो उसके उच्च अधिकारियों से शिकायत की जा सकती थी। मगर कैमरे के सामने इस तरह का व्यवहार न केवल अनुचित है, बल्कि यह शिष्टाचार और प्रशासनिक मर्यादा के भी खिलाफ माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आजकल कुछ जनप्रतिनिधि सोशल मीडिया पर अपनी “तेवर वाली छवि” बनाने के लिए इस तरह के व्यवहार का सहारा लेते हैं। कैमरे के सामने ऊंची आवाज में बोलना, आक्रामक दिखना—इसे राजनीतिक लोकप्रियता का शॉर्टकट समझ लिया गया है। लेकिन इस प्रक्रिया में वे यह भूल जाते हैं कि सामने खड़ा अधिकारी भी एक इंसान है—किसी का पिता, भाई या परिवार का सदस्य—जिसकी सामाजिक प्रतिष्ठा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
घटना में एक और पहलू भी सामने आया है—पार्षद और नायब तहसीलदार की उम्र में स्पष्ट अंतर होने के बावजूद पार्षद का व्यवहार अत्यधिक आक्रामक और असंयमित दिखा। यह स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि कहीं न कहीं सत्ता का अहंकार शालीनता पर भारी पड़ रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि ज्ञापन देना ही उद्देश्य था, तो तहसील दिवस के दौरान अधिकारी के कक्ष में जाकर भी इसे सौंपा जा सकता था। लेकिन जिस तरीके से पूरे घटनाक्रम को अंजाम दिया गया, उससे यह अधिक एक “पब्लिसिटी स्टंट” जैसा प्रतीत होता है, न कि जनहित का गंभीर प्रयास।
यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या राजनीति अब सेवा से ज्यादा प्रदर्शन का माध्यम बनती जा रही है? क्या जनप्रतिनिधियों को अपने आचरण के लिए कोई आचार संहिता नहीं माननी चाहिए?
फिलहाल, यह वीडियो प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। जरूरत इस बात की है कि जनप्रतिनिधि अपने अधिकारों के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारियों और मर्यादाओं को भी समझें—ताकि लोकतंत्र की गरिमा बनी रहे।