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टांडा जंगल में मौत बनकर घूम रहा टस्कर: 72 घंटे में तीसरी जान, गरीबों के दर्द के बीच ‘नेतागिरी’ भी शुरू
लालकुआं/पन्तनगर।
तराई के टांडा जंगल में एक खूंखार टस्कर हाथी का आतंक थमने का नाम नहीं ले रहा है। शुक्रवार को पन्तनगर कोतवाली क्षेत्र के अंतर्गत जंगल में लकड़ी बीनने गई एक 60 वर्षीय महिला को हाथी ने बेरहमी से कुचलकर मार डाला। इस दर्दनाक घटना के साथ ही बीते 72 घंटों में हाथी के हमले से मरने वालों की संख्या तीन पहुंच गई है, जिससे पूरे क्षेत्र में दहशत और गुस्से का माहौल है।
ग्रामीणों के अनुसार, मृतक महिला रोज़ की तरह जंगल में ईंधन लकड़ी लेने गई थी, तभी अचानक झाड़ियों से निकले टस्कर ने उस पर हमला कर दिया। हाथी ने उसे सूंड से पटक-पटक कर मौके पर ही मौत के घाट उतार दिया। घटना के बाद जंगल में चीख-पुकार मच गई और आसपास के लोग भय के कारण मौके पर जाने की हिम्मत तक नहीं जुटा सके।
बताया जा रहा है कि दो दिन पहले भी इसी हाथी ने सांप पठानी क्षेत्र में खेत में सो रहे दो लोगों को कुचलकर मार डाला था। इनमें से एक मृतक की अब तक शिनाख्त तक नहीं हो पाई है। लगातार हो रही इन घटनाओं ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
😟 गरीबों पर कहर, सिस्टम बेअसर
टांडा और आसपास के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले अधिकतर लोग जंगल पर ही निर्भर हैं—चाहे वह लकड़ी हो, चारा हो या अन्य जरूरतें। ऐसे में जान जोखिम में डालकर जंगल जाना उनकी मजबूरी है। लेकिन अब यही जंगल उनके लिए मौत का कारण बनता जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग की ओर से न तो कोई ठोस सुरक्षा व्यवस्था की गई है और न ही हाथी को काबू करने के लिए प्रभावी कदम उठाए गए हैं।
🎭 दर्द के बीच राजनीति की एंट्री
घटना की सूचना मिलते ही किच्छा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला मौके पर पहुंचे। उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया और पीड़ित परिवार से मुलाकात कर हर संभव सरकारी मदद दिलाने का भरोसा दिया।
हालांकि, स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर नाराजगी भी देखने को मिली कि जब लगातार जानें जा रही हैं, तब नेताओं का घटनास्थल पर पहुंचना केवल औपचारिकता बनकर रह गया है। लोगों का कहना है कि
“जब जिंदा रहते सुरक्षा नहीं मिलती, तो मौत के बाद दिलासा किस काम का?”
⚠️ वन विभाग पर उठे सवाल
लगातार हो रही मौतों के बावजूद हाथी को ट्रैक करने, पकड़ने या आबादी से दूर करने की कोई ठोस रणनीति अब तक सामने नहीं आई है। इससे साफ है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने में जिम्मेदार विभाग पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है।
🧭 खौफ के साए में जीवन
टांडा, लालकुआं, पन्तनगर और आसपास के गांवों में लोग अब जंगल की ओर जाने से डर रहे हैं। बच्चों और महिलाओं को घर से बाहर निकलने में भी भय लग रहा है।
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि हाथी को जल्द से जल्द काबू किया जाए, प्रभावित परिवारों को मुआवजा दिया जाए और क्षेत्र में सुरक्षा के ठोस इंतजाम किए जाएं।
👉 निष्कर्ष:
एक ओर जंगल से जीवन चलाने को मजबूर गरीब परिवार हैं, दूसरी ओर बेकाबू जंगली हाथी का आतंक—और इनके बीच खड़ा है एक ऐसा सिस्टम, जो अभी तक सिर्फ आश्वासन देता नजर आ रहा है। सवाल यही है कि आखिर कब रुकेगा यह खूनी खेल?
टांडा जंगल में मौत बनकर घूम रहा टस्कर: 72 घंटे में तीसरी जान, गरीबों के दर्द के बीच ‘नेतागिरी’ भी शुरू लालकुआं/पन्तनगर।
