संत राजिंदर सिंह जी महाराज ने दिया संदेश: बाहरी आजादी के साथ आत्मिक स्वतंत्रता भी जरूरी
नई दिल्ली। स्वतंत्रता दिवस केवल देश को मिली बाहरी आजादी का उत्सव नहीं, बल्कि स्वयं को भीतर से स्वतंत्र करने का भी अवसर है। संत राजिंदर सिंह जी महाराज ने कहा कि हमें बाहरी स्वतंत्रता का जश्न मनाने के साथ-साथ अपने जीवन में आत्मिक यानी आंतरिक स्वतंत्रता प्राप्त करने का भी प्रयास करना चाहिए। उन्होंने ध्यान-अभ्यास के माध्यम से मनुष्य के भीतर मौजूद आत्मिक शक्ति को पहचानने और मन-माया के बंधनों से मुक्त होने का संदेश दिया।
संत राजिंदर सिंह जी महाराज के अनुसार, महापुरुषों ने समझाया है कि आत्मा जब से पिता-परमेश्वर से अलग होकर इस संसार में आई है, तब से वह मन और माया के बंधनों में उलझ गई है। मनुष्य स्वयं को केवल शरीर समझकर बाहरी संसार और इंद्रियों के भोगों में फंस जाता है। संसार की चकाचौंध में वह अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है और यह भी समझ नहीं पाता कि यह संसार उसका स्थायी घर नहीं, बल्कि एक सराय के समान है।
उन्होंने कहा कि आत्मा अपने मूल स्वरूप में ज्योति, प्रकाश, प्रेम और शांति से परिपूर्ण है। लेकिन संसार में रहते हुए मनुष्य पांचों इंद्रियों के माध्यम से लगातार बाहरी आकर्षणों की ओर खिंचता चला जाता है। इसके परिणामस्वरूप काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे विकार मनुष्य के जीवन पर अपना प्रभाव बढ़ाते जाते हैं। यही आंतरिक बंधन मनुष्य को वास्तविक स्वतंत्रता से दूर रखते हैं।
संत राजिंदर सिंह जी महाराज ने बताया कि आत्मिक स्वतंत्रता का मार्ग ध्यान-अभ्यास से होकर गुजरता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने भीतर पिता-परमेश्वर के आंतरिक प्रकाश और ध्वनि पर ध्यान केंद्रित करने का अभ्यास करना चाहिए। नियमित ध्यान के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर मौजूद आत्मा की अपार शक्ति और ऊर्जा का अनुभव कर सकता है।
संत जी के अनुसार, आत्मा के भीतर विवेक, निर्भयता, अमरता, अनंत प्रेम और परमानंद जैसे महान गुण मौजूद हैं। जब पूर्ण सतगुरु की सहायता और मार्गदर्शन से आत्मा पिता-परमेश्वर की अनंत शक्ति से जुड़ती है, तब मनुष्य धीरे-धीरे मन, माया और विकारों के बंधनों से ऊपर उठने की दिशा में आगे बढ़ता है।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता दिवस हमें देश की आजादी के संघर्ष और उसके महत्व की याद दिलाता है, लेकिन इसी अवसर पर हमें अपने भीतर झांकने की भी आवश्यकता है। बाहरी परिस्थितियों से मिली स्वतंत्रता के साथ यदि मनुष्य अपने विचारों, इच्छाओं और विकारों के बंधनों से मुक्त होने का प्रयास करे, तो उसके जीवन में वास्तविक शांति और आनंद का अनुभव हो सकता है।
संत राजिंदर सिंह जी महाराज का संदेश है कि स्वतंत्रता का उत्सव केवल एक दिन तक सीमित न रहे, बल्कि प्रतिदिन ध्यान-अभ्यास के माध्यम से आत्मिक उन्नति और सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त करने का प्रयास किया जाए।

